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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  1.17.70 
श्रीधरेर लौह - पात्रे कैल जल - पान ।
समस्त भक्तेरे दिल इष्ट वर - दान ॥70॥
 
 
अनुवाद
एक बार भगवान चैतन्य महाप्रभु कीर्तन के बाद श्रीधर के घर गए और उनके टूटे हुए लोहे के बर्तन से पानी पिया। फिर उन्होंने सभी भक्तों को उनकी इच्छानुसार आशीर्वाद दिया।
 
Once, after a kirtan, Chaitanya Mahaprabhu went to Sridhar's house and drank water from a broken iron vessel. He then granted all his devotees their desired boons.
तात्पर्य
चंद काजी नामक मजिस्ट्रेट के विरुद्ध होने वाले नागर-संकीर्तन के बाद काजी भक्त बन गए। फिर श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी संकीर्तन पार्टी के साथ श्रीधर के घर लौट आए और चंद काजी उनके पीछे-पीछे गए। सभी भक्त वहां कुछ देर विश्राम किया और श्रीधर के क्षतिग्रस्त लोहे के बर्तन से पानी पिया। प्रभु ने पानी इसलिए स्वीकार किया क्योंकि बर्तन किसी भक्त का था। इसके बाद चंद काजी अपने घर लौट गए। जहां वे विश्राम करते थे वह स्थान अब भी मायापुर के उत्तरपूर्वी तरफ स्थित है और इस स्थान को कीर्तन-विश्राम-स्थान, भक्तों के कीर्तन के विश्राम स्थान के नाम से जाना जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)