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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  1.17.68 
तबे आचार्य - गोसाञि र आनन्द हइल ।
लजित हइया प्रभु प्रसाद करिल ॥68॥
 
 
अनुवाद
उस समय अद्वैत आचार्य अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान् यह बात समझ गए, और उन्हें कुछ लज्जा भी हुई, फिर भी उन्होंने अद्वैत आचार्य को अपना आशीर्वाद दिया।
 
Advaita Acharya was then overjoyed. Mahaprabhu understood this and felt somewhat ashamed, but he granted Advaita Acharya his desired boon.
तात्पर्य
अद्वैत आचार्य, माधवेंद्रपुरी के शिष्य थे, जो ईश्वरपुरी के आध्यात्मिक गुरु थे। इसलिए ईश्वरपुरी, श्री चैतन्य महाप्रभु के आध्यात्मिक गुरु, अद्वैत आचार्य के गुरुभाई थे। इस दृष्टिकोण से, श्री चैतन्य महाप्रभु अद्वैत आचार्य को अपने आध्यात्मिक गुरु के रूप में मानते थे, पर श्री अद्वैत आचार्य को भगवान चैतन्य का यह व्यवहार पसंद नहीं था, क्योंकि वे अपने आपको उनका शाश्वत सेवक ही मानना चाहते थे। अद्वैत प्रभु की आकांक्षा भगवान के सेवक की थी, उनके आध्यात्मिक गुरु की नहीं। इसलिए उन्होंने भगवान से अपने आपको अलग रखने की योजना बनाई। उन्होंने कुछ असहाय मायावादियों के बीच दार्शनिक अनुमान के मार्ग को समझाना शुरू किया, और जब भगवान चैतन्य महाप्रभु ने इस बारे में सुना, तो वे तुरंत वहां गए और बहुत क्रोधित होकर अद्वैत आचार्य को पीटने लगे। उस समय, अद्वैत आचार्य बहुत प्रसन्न हुए, और नाचते हुए कहने लगे, "देखो कैसे मेरी इच्छा अब पूरी हो गई है! भगवान चैतन्य महाप्रभु लंबे समय तक मेरे साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते थे, पर अब वे मेरे साथ उपेक्षित व्यवहार कर रहे हैं। यह मेरा प्रतिफल है। मेरे प्रति उनका स्नेह इतना महान है कि वे मुझे मायावादियों के हाथों से बचाना चाहते हैं।" इस कथन को सुनकर, भगवान चैतन्य महाप्रभु को थोड़ी शर्मिंदगी हुई, पर वे अद्वैत आचार्य से बहुत प्रसन्न थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)