श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.17.66 
आचार्य - गोसाञि रे प्रभु करे गुरु - भक्ति ।
ताहाते आचार्य बड़ हय दुःख - मति ॥66॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य अद्वैत आचार्य को अपने आध्यात्मिक गुरु के रूप में सम्मान देते थे, लेकिन अद्वैत आचार्य प्रभु इस तरह के व्यवहार से बहुत दुखी थे।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu respected Advaita Acharya as his guru, but Advaita Acharya was deeply saddened by his behavior.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)