श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  1.17.62 
शापिब तोमारे मुञि, पाञाछि मनो - दुःख ।
पैता छिण्डिया शापे प्रचण्ड दुर्मुख ॥62॥
 
 
अनुवाद
वह ब्राह्मण कटु वचन बोलने और दूसरों को शाप देने में निपुण था। इसलिए उसने अपना जनेऊ तोड़ दिया और कहा, "अब मैं तुम्हें शाप दूँगा, क्योंकि तुम्हारे आचरण से मुझे बहुत दुःख हुआ है।"
 
The Brahmin was harsh-tongued and adept at cursing others. He broke his sacred thread and declared, “Now I will curse you, because your behavior has caused me great pain.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)