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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  1.17.54 
एत बलि’ गेला प्रभु करिते गङ्गा - स्नान ।
सेइ पापी दुःख भोगे, ना याय पराण ॥54॥
 
 
अनुवाद
यह कहकर भगवान गंगा स्नान करने चले गए और उस पापी ने प्राण नहीं त्यागे, अपितु कष्ट भोगता रहा।
 
Saying this, Mahaprabhu went to take bath in the Ganga and that sinner did not die, but continued to suffer.
तात्पर्य
ऐसा प्रतीत होता है कि वैष्णव का अपराधी निरंतर कष्ट उठाता रहता है और वह अपना जीवन नहीं त्यागता|हमने वास्तव में देखा है कि एक महान वैष्णव-अपराधी लगातार इतना अधिक कष्ट उठाता रहा कि उसे चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया,और फिर भी उसकी मृत्यु नहीं हुई|
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)