आरे पापि, भक्त - द्वेषि, तोरे न उद्धारिमु ।
कोटि - जन्म एइ मते कीड़ाय खाओयाइमु ॥51॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
"हे पापी, शुद्ध भक्तों से ईर्ष्या करने वाले, मैं तेरा उद्धार नहीं करूँगा! बल्कि, मैं तुझे लाखों वर्षों तक इन कीटाणुओं से दंशित रखूँगा।"
"O sinner, hater of pure devotees, I will not save you! I will let you be bitten by these insects for millions of years."
तात्पर्य
यहाँ हमें यह ध्यान देना चाहिए कि इस भौतिक संसार में हमारे सभी कष्ट, विशेषकर रोग आदि, हमारे पिछले पापों के कारण होते हैं और सभी प्रकार के पापों में ईर्ष्या के कारण किसी शुद्ध भक्त के विरुद्ध किए गए कार्य सबसे गंभीर माने जाते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु चाहते थे कि गोपाल चापल को उसके कष्ट का कारण समझ में आ जाए। कोई भी व्यक्ति जो श्री नाम का प्रचार करने वाले शुद्ध भक्त को कष्ट देता है उसे भी गोपाल चापल की तरह अवश्य ही दंड मिलता है। यही श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा है। आगे हम देखेंगे कि जो व्यक्ति शुद्ध भक्त को ठेस पहुँचाता है वह कभी भी श्री चैतन्य महाप्रभु को संतुष्ट नहीं कर सकता, जब तक और तब तक वह अपने अपराध के लिए ईमानदारी से पछतावा न करे और उसे ठीक न कर ले।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥