श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.17.50 
एत शुनि’ महाप्रभुर हुइल क्रुद्ध मन ।
क्रोधावेशे बले तारे तर्जन - वचन ॥50॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर चैतन्य महाप्रभु बहुत क्रोधित हुए और क्रोध की अवस्था में उन्होंने उसे डाँटते हुए कुछ शब्द कहे।
 
Hearing this, Chaitanya Mahaprabhu became extremely angry and in that anger he said some abusive words to him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)