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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.17.44 
हाड़िके आनिया सब दूर कराइल ।
जल - गोमय दिया सेइ स्थान लेपाइल ॥44॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने एक सफाईकर्मी को बुलाया, जिसने पूजा की सभी सामग्रियों को दूर फेंक दिया और पानी और गोबर के मिश्रण से पोछा लगाकर जगह को साफ कर दिया।
 
He called a sweeper (hadi), who threw away all the puja materials and purified the place by smearing it with water and cow dung.
तात्पर्य
वैदिक समाज में जो पुरुष मल उठाने और सड़कें साफ करने जैसे सार्वजनिक स्वच्छता अभियान में लगे हुए हैं, उन्हें हाड़ियाँ कहा जाता है। कभी-कभी उन्हें अछूत माना जाता है, खासकर जब वे अपने पेशे में लगे होते हैं, फिर भी ऐसे हाड़ियों को भी भक्त बनने का अधिकार है। यह श्री भगवद गीता (9.32) द्वारा स्थापित है, जहाँ भगवान घोषणा करते हैं:

मां हि पार्थ व्यापश्रित्य ये अपि स्युः पाप-योनायः

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास ते अपि यान्ति पराम् गतिम्

"हे प्रथा के पुत्र, जो लोग मुझमें शरण लेते हैं, भले ही वे निम्न जन्म के हों - स्त्रियाँ, वैश्य [व्यापारी] और शूद्र [श्रमिक] - वे भी परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।"

भारत में निम्न जाति के कई अछूत हैं, लेकिन वैष्णव सिद्धांतों के अनुसार आध्यात्मिक जीवन के स्तर पर कृष्ण चेतना आंदोलन को स्वीकार करने के लिए सभी का स्वागत है और इस प्रकार परेशानी से मुक्त हो सकते हैं। भौतिक मंच पर समानता और बंधुत्व संभव नहीं है।

जब भगवान चैतन्य घोषित करते हैं कि "तृणाद अपि सुनीचेन तरोर इव सहष्णुना", तो इसका मतलब यह है कि जीवन की भौतिक धारणा से ऊपर होना चाहिए। जब कोई अच्छी तरह से समझता है कि वह भौतिक शरीर नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक आत्मा है, तो वह निम्न जातियों के एक व्यक्ति से भी विनम्र है, क्योंकि वह आध्यात्मिक रूप से ऊंचा है। ऐसी विनम्रता, जिसमें कोई खुद को घास से भी नीचा समझता है, सुनीचत्व कहलाता है, और पेड़ से भी अधिक सहनशील होने को सहष्णुत्व, सहनशीलता कहा जाता है। भक्ति सेवा में स्थित होने के कारण, भौतिक जीवन की अवधारणा की परवाह नहीं करना, अमानित्व कहलाता है, भौतिक सम्मान के प्रति उदासीनता; फिर भी इस प्रकार स्थित एक भक्त को मान-दा कहा जाता है, क्योंकि वह बिना किसी हिचकिचाहट के दूसरों को सम्मान देने के लिए तैयार रहते हैं।

महात्मा गांधी ने अछूतों को शुद्ध करने के लिए हरि-जन आंदोलन शुरू किया, लेकिन वह असफल रहे क्योंकि उनका मानना था कि कोई किसी प्रकार के भौतिक समायोजन के माध्यम से हरि-जन, भगवान का व्यक्तिगत सहयोगी बन सकता है। यह संभव नहीं है। जब तक कोई पूरी तरह से यह नहीं समझ लेता कि वह शरीर नहीं है बल्कि एक आध्यात्मिक आत्मा है, तो उसके हरि-जन बनने का कोई सवाल ही नहीं है। जो लोग भगवान चैतन्य महाप्रभु और उनके शिष्य उत्तराधिकार के पदचिन्हों पर नहीं चलते, वे पदार्थ और आत्मा के बीच अंतर नहीं कर सकते, और इसलिए उनके सभी विचार समस्याओं का एक मिश्रित-अप हॉजपोज हैं। वे मायादेवी के भ्रामक नेटवर्क में वस्तुतः खो गए हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)