श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 333
 
 
श्लोक  1.17.333 
श्री - कृष्ण - चैतन्य, अद्वैत, नित्यानन्द ।
श्रीवास - गदाधरादि यत भक्त - वृन्द ॥333॥
 
 
अनुवाद
[यहाँ लेखक पुनः पंचतत्व का वर्णन करता है।] श्री कृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानंद, श्री अद्वैत, गदाधर, श्रीवास तथा भगवान चैतन्य के सभी भक्त।
 
[Here the author again describes the Panchatattva.] Sri Krishna Chaitanya, Lord Nityananda, Sri Advaita, Gadadhara, Srivasa and all the devotees of Mahaprabhu!
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)