तृणादपि सु - नीचेन तरोरिव सहिष्णुना ।
अमानिना मान - देन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥31॥
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अनुवाद
"जो व्यक्ति स्वयं को घास से भी कमतर समझता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहनशील है, तथा जो व्यक्तिगत सम्मान की अपेक्षा नहीं करता, तथापि दूसरों को पूरा सम्मान देने के लिए सदैव तत्पर रहता है, वह बहुत आसानी से भगवान के पवित्र नाम का जप कर सकता है।"
“He who considers himself more insignificant than grass, who is more tolerant than a tree, and who does not expect any personal respect from anyone, yet is always ready to give respect to others, can easily chant the holy name of the Lord forever.”
तात्पर्य
घास का विशेष रूप से इस पद्य में उल्लेख किया गया है क्योंकि हर कोई उस पर चलता है फिर भी घास कभी विरोध नहीं करती। यह उदाहरण बताता है कि एक आध्यात्मिक गुरु या नेता को अपनी स्थिति पर गर्व नहीं करना चाहिए; एक सामान्य व्यक्ति से हमेशा विनम्र रहते हुए, उसे हरि कृष्ण मंत्र का जाप करके चैतन्य महाप्रभु के पंथ का प्रचार करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥