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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 307
 
 
श्लोक  1.17.307 
तकर्े इहा नाहि माने येइ दुराचार ।
कुम्भीपाके पचे, तार नाहिक निस्तार ॥307॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई केवल सांसारिक तर्कों पर अड़ा रहता है और इस कारण इसे स्वीकार नहीं करता, तो वह कुंभीपाक नरक में जलेगा। उसके लिए कोई मुक्ति नहीं है।
 
If one remains unnecessarily entangled in these worldly arguments and does not accept this, he remains boiling in oil in the hell of Kumbhipaka. He is not saved.
तात्पर्य
कुम्भीपाक, नरक का एक भाग है, जिसका वर्णन श्रीमद्-भागवतम् (5.26.13) में किया गया है, जिसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति अपनी जीभ को संतुष्ट करने के लिए जीवित पक्षियों और जानवरों को पकाता है उसे मृत्यु के बाद यमराज के सामने लाया जाता है और कुम्भीपाक नरक में दंडित किया जाता है। वहां उसे कुम्भी-पाक नामक उबलते तेल में डाल दिया जाता है, जहाँ से कोई मुक्ति नहीं है। कुम्भीपाक उन लोगों के लिए है जो अनावश्यक रूप से ईर्ष्या करते हैं। जो लोग श्री चैतन्य महाप्रभु की गतिविधियों से ईर्ष्या करते हैं, उन्हें इस नारकीय स्थिति में दंडित किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)