श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 303
 
 
श्लोक  1.17.303 
अतएव आपने प्रभु गोपी - भाव ध रि’ ।
व्रजेन्द्र - नन्दने कहे ‘प्राण - नाथ’ करि’ ॥303॥
 
 
अनुवाद
इसलिए भगवान स्वयं गोपियों के भावपूर्ण उल्लास को स्वीकार करते हुए अब नन्द महाराज के पुत्र से कहते हैं, "हे मेरे प्राणों के स्वामी! हे मेरे प्रिय पति!"
 
That is why the Lord Himself, assuming the attitude of a Gopi, now addresses the son of Nanda Maharaja as, “O my beloved! O my beloved husband!”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)