श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 299
 
 
श्लोक  1.17.299 
सख्य, दास्य, दुइ भाव सहज ताँहार ।
कभु प्रभु करेन ताँरे गुरु - व्यवहार ॥299॥
 
 
अनुवाद
उनकी स्वाभाविक भावनाएँ सदैव भाईचारे और दासता के स्तर पर थीं, लेकिन भगवान कभी-कभी उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे।
 
His natural feelings were always at the level of friendship and servitude, but Mahaprabhu sometimes treated him like his spiritual guru.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)