श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 292
 
 
श्लोक  1.17.292 
राधार विशुद्ध - भावेर अचिन्त्य प्रभाव ।
ये कृष्णेरे कराइला द्वि - भुज - स्वभाव ॥292॥
 
 
अनुवाद
राधारानी के शुद्ध आनंद का प्रभाव इतना अकल्पनीय है कि उसने कृष्ण को अपने मूल द्विभुज रूप में आने के लिए विवश कर दिया।
 
The effect of Radharani's pure devotion is so inconceivably great that it compelled Krishna to assume His original two-armed form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)