श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 288
 
 
श्लोक  1.17.288 
“नमो नारायण, देव करह प्रसाद ।
कृष्ण - सङ्ग देह’ मोर घुचाह विषाद” ॥288॥
 
 
अनुवाद
"हे भगवान नारायण, हम आपको सादर प्रणाम करते हैं। हम पर कृपा करें। हमें कृष्ण की संगति प्रदान करें और इस प्रकार हमारे शोक का नाश करें।"
 
"O Lord Narayana, we offer our respectful obeisances unto You. Please be kind to us. Please grant us the association of Krishna and thus dispel our sorrow."
तात्पर्य
नारायण के चार-भुजाधारी रूप को देखकर भी गोपियाँ प्रसन्न नहीं हुईं। फिर भी वे भगवान से पूज्यनीय व्यक्तित्व की आराधना करती रहीं और उनसे कृष्ण के साथ जुड़ाव प्राप्त करने का वरदान माँगती रहीं। ऐसी है गोपियों की परमानंद की भावना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)