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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 276
 
 
श्लोक  1.17.276 
स्व - माधुर्य राधा - प्रेम - रस आस्वादिते ।
राधा - भाव अङ्गी करियाछे भाल - मते ॥276॥
 
 
अनुवाद
श्रीमति राधारानी के कृष्ण के साथ प्रेम संबंधों के मधुर रस का स्वाद लेने के लिए, तथा कृष्ण में आनंद के भंडार को समझने के लिए, श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में स्वयं कृष्ण ने राधारानी के भाव को स्वीकार किया।
 
To taste the essence of Srimati Radharani's love for Krishna and to understand the reservoir of bliss in the form of Krishna, Krishna himself accepted the form of Radharani in the form of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
इस संबंध में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में लिखा है, "श्री गौरासुंदर स्वयं श्रीमती राधारानी के भाव के साथ कृष्ण है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कभी भी गोपियों के भाव को नहीं त्यागा। वे हमेशा कृष्ण के अधीन रहे और किसी साधारण स्त्री के साथ दांपत्य प्रेम का अनुकरण करके कभी भी प्रधान की भूमिका स्वीकार नहीं की, जैसा कि सहजिया आमतौर पर करते हैं। उन्होंने कभी भी खुद को एक दुष्ट व्यभिचारी के रूप में नहीं रखा। सहजिया-सम्प्रदाय के सदस्यों जैसे कामुक भौतिकवादी स्त्रियों के लिए तृष्णा करते हैं, यहाँ तक कि दूसरों की पत्नियों के लिए भी। लेकिन जब वे अपनी वासनापूर्ण गतिविधियों की जिम्मेदारी श्री चैतन्य महाप्रभु पर थोपने की कोशिश करते हैं, तो वे स्वरूप दामोदर और श्रील वृंदावन दास ठाकुर के अपराधी बन जाते हैं। श्री चैतन्य-भागवत, आदि-खंड, अध्याय पंद्रह में कहा गया है:

सबै पर-स्त्रीरा प्रति नहि परिहास/ स्त्री देखि दूरे प्रभु हेन एक-पास

"श्री चैतन्य महाप्रभु ने कभी भी अन्य की पत्नियों के साथ मजाक भी नहीं किया। जैसे ही वह किसी महिला को आते हुए देखते थे, वह तुरंत उसे बातचीत किए बिना गुजरने के लिए पर्याप्त जगह दे देते थे।' वह स्त्रियों के संगति को लेकर बेहद सख्त थे। हालाँकि, सहजिया खुद को श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी बताते हैं, जबकि वे स्त्रियों के साथ कामुक संबंधों में लिप्त रहते हैं। अपनी युवावस्था में भगवान चैतन्य सभी के साथ बहुत विनोदी थे, परंतु उन्होंने कभी किसी महिला के साथ मजाक नहीं किया, और न ही इस अवतार में उन्होंने स्त्रियों के बारे में बात की। गौरांग नागरी पार्टी को श्री चैतन्य महाप्रभु या वृंदावन दास ठाकुर द्वारा स्वीकृत नहीं है। भले ही कोई चैतन्य महाप्रभु को सभी प्रकार की प्रार्थनाएं अर्पित कर सकता है, परंतु उसे उन्हें गौरांग नागर के रूप में पूजने से सख्ती से बचना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु का निजी व्यवहार और श्री वृंदावन दास ठाकुर द्वारा लिखे गए छंदों ने गौरांग नागरियों की वासनापूर्ण इच्छाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)