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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 275
 
 
श्लोक  1.17.275 
यशोदा - नन्दन हैला शचीर नन्दन ।
चतुर्विध भक्त - भाव करे आस्वादन ॥275॥
 
 
अनुवाद
वही भगवान जो माता यशोदा के पुत्र के रूप में प्रकट हुए थे, अब चार प्रकार की भक्ति का आनंद लेते हुए माता शची के पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं।
 
The Supreme Personality of Godhead, who appeared as the son of Mother Yashoda, has now appeared as the son of Mother Shachi and is enjoying the four types of devotional feelings.
तात्पर्य
भक्ति की चार तरह की गतिविधयाँ हैं- दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य रस। शांत रस, भक्ति सेवा की सीमांत अवस्था है जहाँ कोई गतिविधि नहीं है। किन्तु शांत रस से ऊपर दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य रस हैं, जो भक्ति-सेवा के क्रमिक विकास को उच्चतर से उच्चतर प्लेटफ़ॉर्म की ओर ले जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)