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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 272
 
 
श्लोक  1.17.272 
एत बलि’ भारती गोसाञि काटोयाते गेला ।
महाप्रभु ताहा याइ’ सन्न्यास करिला ॥272॥
 
 
अनुवाद
यह कहकर, आध्यात्मिक गुरु केशव भारती अपने गाँव कटवा लौट गए। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ जाकर संन्यास ग्रहण किया।
 
Having said this, Guru Keshav Bharati returned to his village, Katwa. Sri Chaitanya Mahaprabhu went there and took sannyasa.
तात्पर्य
उन्होंने अपने चौबीसवें वर्ष के अंत में शुक्ल पक्ष में श्री चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप छोड़ा और निदाया-घाट नामक स्थान पर गंगा नदी को पार किया। फिर वह कंटक-नगर या काटोया (कटवा) पहुँचे, जहाँ शाङ्कर सम्प्रदाय के अनुसार एक-दण्ड सन्यास स्वीकार किया। चूँकि केशव भारती शाङ्कर सम्प्रदाय से थे, वे चैतन्य महाप्रभु को वैष्णव सन्यास क्रम में दीक्षा नहीं दे सकते थे, जिसके सदस्यों के पास त्रि-दण्ड होता है।

चन्द्रशेखर आचार्य ने स्वामी की सन्यास स्वीकार करने के नियमित कर्मकाण्ड में सहायता की। श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार पूरे दिन कीर्तन किया गया और दिन के अंत में स्वामी ने अपने बालों को मुंडवा लिया। अगले दिन वह एक नियमित संन्यासी बने, जिसमें एक दण्ड (एक-दण्ड) था। उस दिन से, उनका नाम श्री कृष्ण चैतन्य रखा गया। इससे पहले, उन्हें निमाई पण्डित के नाम से जाना जाता था। श्री चैतन्य महाप्रभु, सन्यास के क्रम में, राढ़देश की यात्रा की, जो वह क्षेत्र है जहाँ गंगा नदी दिखाई नहीं देती। केशव भारती कुछ दूरी तक उनके साथ रहे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)