Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
प्रभु ने उसे आदरपूर्वक प्रणाम किया और अपने घर आमंत्रित किया। उसे भरपेट भोजन कराने के बाद, उन्होंने उसे अपनी प्रार्थना प्रस्तुत की।
Mahaprabhu offered his respectful obeisances and invited him to his home. After feeding him well, Mahaprabhu made a request to him.
तात्पर्य
वैदिक समाज की व्यवस्था के अनुसार, जब भी कोई अज्ञात संन्यासी किसी गांव या कस्बे में आता है, तो किसी न किसी को उसे अपने घर में प्रसाद लेने के लिए आमंत्रित करना चाहिए। संन्यासी सामान्य रूप से ब्राह्मण के घर में प्रसाद लेते हैं क्योंकि ब्राह्मण भगवान नारायण, शिला या शालिग्राम-शिला की पूजा करते हैं और इसलिए, प्रसाद होता है, जिसे संन्यासी ले सकते हैं। केशव भारती ने श्री चैतन्य महाप्रभु का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। इस प्रकार भगवान को उनसे संन्यास लेने की अपनी इच्छा व्यक्त करने का एक अच्छा अवसर मिल गया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥