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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 269
 
 
श्लोक  1.17.269 
प्रभु ताँरे नमस्क रि’ कैल निमन्त्रण ।
भिक्षा कराइया ताँरे कैल निवेदन ॥269॥
 
 
अनुवाद
प्रभु ने उसे आदरपूर्वक प्रणाम किया और अपने घर आमंत्रित किया। उसे भरपेट भोजन कराने के बाद, उन्होंने उसे अपनी प्रार्थना प्रस्तुत की।
 
Mahaprabhu offered his respectful obeisances and invited him to his home. After feeding him well, Mahaprabhu made a request to him.
तात्पर्य
वैदिक समाज की व्यवस्था के अनुसार, जब भी कोई अज्ञात संन्यासी किसी गांव या कस्बे में आता है, तो किसी न किसी को उसे अपने घर में प्रसाद लेने के लिए आमंत्रित करना चाहिए। संन्यासी सामान्य रूप से ब्राह्मण के घर में प्रसाद लेते हैं क्योंकि ब्राह्मण भगवान नारायण, शिला या शालिग्राम-शिला की पूजा करते हैं और इसलिए, प्रसाद होता है, जिसे संन्यासी ले सकते हैं। केशव भारती ने श्री चैतन्य महाप्रभु का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। इस प्रकार भगवान को उनसे संन्यास लेने की अपनी इच्छा व्यक्त करने का एक अच्छा अवसर मिल गया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)