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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 266
 
 
श्लोक  1.17.266 
प्रणतिते ह’बे इहार अपराध क्षय ।
निर्मल हृदये भक्ति कराइब उदय ॥266॥
 
 
अनुवाद
"प्रणाम करने से वे अपने सभी अपराधों के फल से मुक्त हो जाएँगे। तब मेरी कृपा से उनके शुद्ध हृदय में भक्ति जागृत होगी।"
 
By offering salutations, the consequences of all their sinful actions will be removed. Then, by My grace, devotion will awaken in their pure hearts.
तात्पर्य
वैदिक आदेश के अनुसार संन्यास केवल एक ब्राह्मण को ही दे सकता है। शंकर-सम्प्रदाय (एकदंड-संन्यास-सम्प्रदाय) संन्यास आदेश केवल जाति ब्राह्मणों या जन्मजात ब्राह्मणों को प्रदान करता है, लेकिन वैष्णव प्रणाली में ब्राह्मण परिवार में जन्म न लेने वाला व्यक्ति भी हरि-भक्ति-विलास के निर्देश के अनुसार ब्राह्मण बनाया जा सकता है (तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणां)। दुनिया के किसी भी कोने से आया कोई भी व्यक्ति दीक्षा की नियमित प्रक्रिया के द्वारा ब्राह्मण बनाया जा सकता है, और जब उसका ब्राह्मण जैसा व्यवहार आता है, और मद्य, अवैध यौन सम्बन्ध, मांस-आहार और जुआ करने से दूर रहता है, तो उसे संन्यास दे दिया जा सकता है। कृष्ण चेतना आंदोलन में वे सभी संन्यासी, जो कि पूरे विश्व में प्रचार कर रहे हैं, वास्तविक ब्राह्मण-संन्यासी हैं। इसलिए तथाकथित जाति ब्राह्मणों को उन्हें सम्मानपूर्वक अभिवादन करने से नहीं रोकना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सिखाए गए तरीके से ऐसा अभिवादन करके, वे अपने अपराधों को घटाएँगे और अपने भावपूर्ण सेवा के प्राकृतिक पद पर स्वतः ही पहुँच जाएँगे। जैसा कि कहा है, नित्य-सिद्ध कृष्ण-प्रेम साध्य कभु नया: कृष्ण-प्रेम एक पवित्र हृदय में जागृत किया जा सकता है। हम संन्यासियों, विशेष रूप से वैष्णव संन्यासियों को जितना अधिक अभिवादन करते हैं, उतना ही हमारे अपराध कम होते हैं और हमारा हृदय पवित्र होता जाता है। केवल एक पवित्र हृदय में ही कृष्ण-प्रेम जाग सकता है। यह श्री चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय, कृष्ण चेतना आंदोलन का मार्ग है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)