कृष्ण चेतना आंदोलन के संन्यासी सच्चे हैं। कृष्ण चेतना आंदोलन के सभी छात्रों ने दीक्षा की नियमित प्रक्रिया को पार कर लिया है। जैसा कि सनातन गोस्वामी द्वारा हरि-भक्ति-विलास में बताया गया है, तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम: दीक्षा की नियमित प्रक्रिया के द्वारा, कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है। इस प्रकार, शुरुआत में हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन के छात्र भक्तों के साथ रहने के लिए सहमति देते हैं, और धीरे-धीरे, चार निषिद्ध गतिविधियों - अवैध यौन संबंध, जुआ, मांसाहार और नशा - को त्याग कर, वे आध्यात्मिक जीवन की गतिविधियों में उन्नत होते जाते हैं। जब किसी को इन सिद्धांतों का नियमित रूप से पालन करते हुए पाया जाता है, तो उसे पहली दीक्षा (हरि-नाम) दी जाती है, और वह नियमित रूप से दिन में कम से कम सोलह चक्कर जप करता है। फिर, छह महीने या एक साल बाद, उसे दूसरी बार दीक्षा दी जाती है और नियमित यज्ञ और अनुष्ठानों के साथ पवित्र धागा दिया जाता है। कुछ समय बाद, जब वह और भी आगे बढ़ता है और इस भौतिक संसार को त्यागने के लिए तैयार हो जाता है, तो उसे सन्यास आदेश दिया जाता है। उस समय उसे स्वामी या गोस्वामी की उपाधि प्राप्त होती है, जिसका अर्थ है "इंद्रियों का स्वामी"। दुर्भाग्य से, भारत में तथाकथित ब्राह्मणों में न तो उनके लिए सम्मान है और न ही उन्हें सच्चे संन्यासी के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने तथाकथित ब्राह्मणों से ऐसे वैष्णव संन्यासियों का सम्मान करने की अपेक्षा की थी। फिर भी, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे सम्मान देते हैं या नहीं, या वे इन संन्यासियों को सच्चा स्वीकार करते हैं या नहीं, क्योंकि शास्त्र ऐसे अवज्ञाकारी तथाकथित ब्राह्मणों के लिए दंड का वर्णन करते हैं। शास्त्रीय आदेश घोषित करता है:
देवता-प्रतिमां दृष्ट्वा यतिं चैव त्रिदण्डिनं
नमस्कारं न कुर्याद् यः प्रायश्चित्तीयते नरः
"जो भगवान के परम व्यक्तित्व, मंदिर में उनकी प्रतिमा या त्रिदण्डी संन्यासी का सम्मान नहीं करता है, उसे प्रायश्चित्त [प्रायश्चित] करना चाहिए।" यदि कोई ऐसे संन्यासी को प्रणाम नहीं करता है, तो निर्धारित प्रायश्चित्त एक दिन का उपवास रखना है।
