Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 265
 
 
श्लोक  1.17.265 
अतएव अवश्य आमि सन्न्यास करिब ।
सन्यासि - बुद्ध्ये मोरे प्रणत हुइब ॥265॥
 
 
अनुवाद
“मैं संन्यास आश्रम को स्वीकार करूंगा, क्योंकि इस प्रकार लोग मुझे संन्यास आश्रम का सदस्य मानकर, मुझे नमस्कार करेंगे।
 
“I will accept the Sannyasa Ashram, because in this way people will salute me knowing that I am a Sanyasi.”
तात्पर्य
वर्णाश्रम व्यवस्था के सामाजिक आदेशों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) के सदस्यों में, ब्राह्मण को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि वह अन्य सभी वर्णों के शिक्षक और आध्यात्मिक गुरु होते हैं। इसी प्रकार, आध्यात्मिक आदेशों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) के बीच, सन्यास आदेश सबसे ऊपर का स्थान रखता है। इसलिए, एक सन्यासी सभी वर्णों और आश्रमों का आध्यात्मिक गुरु होता है, और एक ब्राह्मण से भी अपेक्षा की जाती है कि वह एक सन्यासी को प्रणाम करे। हालाँकि, दुर्भाग्यवश, जाति ब्राह्मण वैष्णव संन्यासी को प्रणाम नहीं करते हैं। वे इतने अभिमानी हैं कि वे भारतीय संन्यासियों को भी प्रणाम नहीं करते हैं, यूरोपीय या अमेरिकी संन्यासियों की बात तो दूर है। हालाँकि, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपेक्षा की थी कि जाति ब्राह्मण भी एक संन्यासी को सम्मानपूर्वक प्रणाम करेंगे क्योंकि पाँच सौ साल पहले सामाजिक प्रथा किसी भी संन्यासी, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात, को तुरंत प्रणाम करने की थी।

कृष्ण चेतना आंदोलन के संन्यासी सच्चे हैं। कृष्ण चेतना आंदोलन के सभी छात्रों ने दीक्षा की नियमित प्रक्रिया को पार कर लिया है। जैसा कि सनातन गोस्वामी द्वारा हरि-भक्ति-विलास में बताया गया है, तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम: दीक्षा की नियमित प्रक्रिया के द्वारा, कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है। इस प्रकार, शुरुआत में हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन के छात्र भक्तों के साथ रहने के लिए सहमति देते हैं, और धीरे-धीरे, चार निषिद्ध गतिविधियों - अवैध यौन संबंध, जुआ, मांसाहार और नशा - को त्याग कर, वे आध्यात्मिक जीवन की गतिविधियों में उन्नत होते जाते हैं। जब किसी को इन सिद्धांतों का नियमित रूप से पालन करते हुए पाया जाता है, तो उसे पहली दीक्षा (हरि-नाम) दी जाती है, और वह नियमित रूप से दिन में कम से कम सोलह चक्कर जप करता है। फिर, छह महीने या एक साल बाद, उसे दूसरी बार दीक्षा दी जाती है और नियमित यज्ञ और अनुष्ठानों के साथ पवित्र धागा दिया जाता है। कुछ समय बाद, जब वह और भी आगे बढ़ता है और इस भौतिक संसार को त्यागने के लिए तैयार हो जाता है, तो उसे सन्यास आदेश दिया जाता है। उस समय उसे स्वामी या गोस्वामी की उपाधि प्राप्त होती है, जिसका अर्थ है "इंद्रियों का स्वामी"। दुर्भाग्य से, भारत में तथाकथित ब्राह्मणों में न तो उनके लिए सम्मान है और न ही उन्हें सच्चे संन्यासी के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने तथाकथित ब्राह्मणों से ऐसे वैष्णव संन्यासियों का सम्मान करने की अपेक्षा की थी। फिर भी, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे सम्मान देते हैं या नहीं, या वे इन संन्यासियों को सच्चा स्वीकार करते हैं या नहीं, क्योंकि शास्त्र ऐसे अवज्ञाकारी तथाकथित ब्राह्मणों के लिए दंड का वर्णन करते हैं। शास्त्रीय आदेश घोषित करता है:

देवता-प्रतिमां दृष्ट्वा यतिं चैव त्रिदण्डिनं

नमस्कारं न कुर्याद् यः प्रायश्चित्तीयते नरः

"जो भगवान के परम व्यक्तित्व, मंदिर में उनकी प्रतिमा या त्रिदण्डी संन्यासी का सम्मान नहीं करता है, उसे प्रायश्चित्त [प्रायश्चित] करना चाहिए।" यदि कोई ऐसे संन्यासी को प्रणाम नहीं करता है, तो निर्धारित प्रायश्चित्त एक दिन का उपवास रखना है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)