कृष्ण - नाम ना लओ केने, कृष्ण - नाम - धन्य ।
‘गोपी’ ‘गोपी’ बलिले वा किबा हय पुण्य ॥249॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
"आप भगवान कृष्ण के पवित्र नाम, जो इतना महिमावान है, के स्थान पर 'गोपी गोपी' नाम क्यों जप रहे हैं? ऐसे जप से आपको कौन-सा पुण्य फल प्राप्त होगा?"
"Why are you calling out, 'Gopi, Gopi,' instead of chanting the glorious and holy name of Lord Krishna? What merit will you gain by doing so?"
तात्पर्य
ऐसा कहा जाता है, वैष्णवेरा क्रिया-मुद्रा विज्ञेहा ना बुझयः: कोई भी एक विशुद्ध भक्त की गतिविधियों को नहीं समझ सकता। एक छात्र या भक्त-नौसिखिए संभावित रूप से समझ नहीं सकता कि श्री चैतन्य महाप्रभु गोपियों के नाम का जप क्यों कर रहे थे, और न ही छात्र को भगवान से गोपी गोपी के नाम का जप करने की शक्ति के बारे में पूछना चाहिए था। भक्त-नौसिखिया निश्चित रूप से कृष्ण के पवित्र नाम के जप में पवित्रता के प्रति आश्वस्त था, लेकिन इस तरह का व्यवहार भी अपमानजनक है। धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्व-शुभ-क्रिया-साम्यम अपि प्रमादः: कृष्ण के पवित्र नाम का जप पवित्रता की प्राप्ति के बदले में करना एक अपराध है। यह निश्चित रूप से, छात्र को पता नहीं था। इस प्रकार उन्होंने मासूमियत से पूछा, "गोपी नाम के जप में क्या पवित्रता है?" वह नहीं जानता था कि पवित्रता या अपवित्रता का कोई प्रश्न नहीं है। कृष्ण या पवित्र नाम गोपी के पवित्र नाम का जप प्रेमपूर्ण मामलों के पारलौकिक मंच पर है। चूँकि वह इस तरह की पारलौकिक गतिविधियों को समझने में विशेषज्ञ नहीं था, इसलिए उसका प्रश्न मात्र ढिठाई भरा था। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु, जो उस पर बहुत क्रोधित थे, ने निम्न प्रकार से प्रतिक्रिया व्यक्त की।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥