श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 248
 
 
श्लोक  1.17.248 
एक पड़या आइल प्रभुके देखिते ।
‘गोपी’ ‘गोपी’ नाम शुनि’ लागिल बलिते ॥248॥
 
 
अनुवाद
भगवान के दर्शन करने आया एक शिष्य यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि भगवान ‘गोपी! गोपी!’ का जाप कर रहे हैं। इस प्रकार उन्होंने यह कहा।
 
A student who had come to see Mahaprabhu was astonished that he was calling out, "Gopi! Gopi!" So he spoke as follows.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)