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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.17.24 
‘केवल’ - शब्दे पुनरपि निश्चय - करण ।
ज्ञान - योग - तप - कर्म - आदि निवारण ॥24॥
 
 
अनुवाद
“केवल’ शब्द का प्रयोग अन्य सभी प्रक्रियाओं का निषेध करता है, जैसे ज्ञान की खेती, रहस्यमय योग का अभ्यास, या तपस्या और सकाम गतिविधियों का प्रदर्शन।
 
The use of the word 'keval' is meant to negate other methods like knowledge, yoga, penance and selfish actions.
तात्पर्य
हमारे कृष्ण चेतना आन्दोलन विशेष रूप से हरि कृष्ण मंत्र के उच्चारण पर जोर देता है, जबकि जो लोग कलियुग में सफलता का रहस्य नहीं जानते वे अनावश्यक रूप से ज्ञान की खोज, रहस्यमय योग के अभ्यास, फल देने वाली गतिविधियों या निरर्थक तपस्या में लगे हुए हैं। वे केवल अपना समय बर्बाद कर रहे हैं और अपने अनुयायियों को गुमराह कर रहे हैं। जब हम किसी श्रोतावर्ग को इस पर बहुत स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं, तो विरोधी समूहों के सदस्य हम पर क्रोधित हो जाते हैं। लेकिन शास्त्रों के आदेशों के अनुसार, हम इन तथाकथित ज्ञानियों, योगियों, कर्मियों और तपस्वियों से समझौता नहीं कर सकते। जब वे कहते हैं कि वे हम जैसे ही अच्छे हैं, तो हमें कहना चाहिए कि केवल हम ही अच्छे हैं और वे अच्छे नहीं हैं। यह हमारे अटलता नहीं है; यह शास्त्रों की आज्ञा है। हमें शास्त्रों के आदेशों से विचलित नहीं होना चाहिए। इसकी पुष्टि चैतन्य-चरितामृत के अगले श्लोक में की गई है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)