श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 235
 
 
श्लोक  1.17.235 
प्रथमेते वृन्दावन - माधुर्य वर्णिल ।
शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द बाड़िल ॥235॥
 
 
अनुवाद
आरम्भ में श्रीवास ठाकुर ने वृन्दावन की लीलाओं की दिव्य मधुरता का वर्णन किया। यह सुनकर भगवान के हृदय में अत्यन्त हर्ष और उल्लास बढ़ता गया।
 
First of all, Srivas Thakur described the divine sweetness of the Vrindavan pastimes, listening to which Mahaprabhu's joy increased immensely.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)