श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 234
 
 
श्लोक  1.17.234 
शुनि’ प्रभु ‘बल’ ‘बल’ बलेन आवेशे ।
श्रीवास वर्णेन वृन्दावन - लीला - रसे ॥234॥
 
 
अनुवाद
यह उत्तर सुनकर भगवान ने आनंदित होकर कहा, "बोलते रहो! बोलते रहो!" इस प्रकार श्रीवास ने श्रीवृन्दावन की लीलाओं के दिव्य रस का वर्णन किया।
 
Hearing this reply, Mahaprabhu said passionately, "Keep talking! Keep talking!" Thus Srivasa described the divine essence of the pastimes of Sri Vrindavan.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)