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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 230
 
 
श्लोक  1.17.230 
तबे त’ करिला सब भक्ते वर दान ।
उच्छिष्ट दिया नारायणीर करिल सम्मान ॥230॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात भगवान ने अपने सभी भक्तों पर कृपा की और नारायणी को विशेष आदर देते हुए अपना बचा हुआ भोजन दिया।
 
Mahaprabhu then granted blessings to all his devotees. He showed special respect to Narayani and offered her his remaining prasad.
तात्पर्य
नारायणी श्रीवासु ठाकुरा के भांजी थीं, और बाद में वे श्रील वृंदावनदास ठाकुर की माता बनीं। इस संबंध में सहजिया एक दुर्भावनापूर्ण कहानी का हवाला देते हैं कि भगवान चैतन्य के भोजन का प्रसाद खाने के बाद नारायणी गर्भवती हो गईं और उन्होंने वृंदावनदास ठाकुर को जन्म दिया। बदमाश सहजिया ऐसे झूठे बयान गढ़ सकते हैं, लेकिन कोई भी उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि वे वैष्णवों के प्रति शत्रुता से प्रेरित होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)