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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 218
 
 
श्लोक  1.17.218 
‘हरि’ ‘कृष्ण’ ‘नारायण’ - लैले तिन नाम ।
बड़ भाग्यवान्तुमि, बड़ पुण्यवान् ॥218॥
 
 
अनुवाद
"क्योंकि तुमने भगवान के तीन पवित्र नामों - हरि, कृष्ण और नारायण - का जप किया है - इसलिए तुम निस्संदेह सबसे भाग्यशाली और पवित्र हो।"
 
“Since you have uttered these three holy names of the Lord – Hari, Krishna and Narayana, you are undoubtedly a highly fortunate and virtuous soul.”
तात्पर्य
यहाँ सर्वोच्च भगवान, श्री चैतन्य महाप्रभु, पुष्टि करते हैं कि जो कोई भी पवित्र नाम हरि, कृष्ण और नारायण बिना किसी अपराध के जपता है, वह निश्चित रूप से अत्यंत भाग्यशाली है, और चाहे भारतीय हो या गैर-भारतीय, हिंदू हो या गैर-हिंदू, वह तुरंत सबसे पवित्र व्यक्तित्व के स्तर पर आ जाता है। इसलिए हम पाषंडियों द्वारा हमारे आंदोलन के अन्य शहरों या देशों के लोगों को वैष्णव बनाने के खिलाफ विरोध करने वाले बयानों की परवाह नहीं करते हैं। हमें भगवान चैतन्य महाप्रभु के चरणों का अनुसरण करते हुए अपने मिशन को शांतिपूर्वक निष्पादित करना है, या, यदि आवश्यक हो, तो ऐसे विरोधियों के सिर पर लात मारनी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)