श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 207
 
 
श्लोक  1.17.207 
उच्च क रि’ गाय गीत, देय करतालि ।
मृदङ्ग - करताल - शब्दे कर्णे लागे तालि ॥207॥
 
 
अनुवाद
“अब वह ऊंचे स्वर में तरह-तरह के गीत गाता है, ताली बजाता है, ढोल और झांझ बजाता है, और ऐसी कर्कश ध्वनि करता है कि हमारे कान बहरे हो जाते हैं।
 
“Now he sings all kinds of songs loudly, claps his hands, plays the mridangam and cymbals and makes noise so loudly that our ears go deaf.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)