श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 184
 
 
श्लोक  1.17.184 
से दिन बहुत नाहि कैलि उत्पात ।
तेजि क्षमा क रि’ ना करिनु प्राणाघात ॥184॥
 
 
अनुवाद
“उस दिन तूने कोई बहुत बड़ा उपद्रव नहीं मचाया था, इसलिए मैं तुझे क्षमा करता हूँ और तेरा प्राण नहीं लेता।
 
You did not create any major disturbance that day, so I have forgiven you and did not take your life.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)