कुछ भक्त प्रभु द्वारा परमानंद के इस प्रदर्शन को सात-प्रहरिया भाव या "इक्कीस घंटे का परमानंद" कहते हैं, और अन्य इसे महाभाव-प्रकाश या महा-प्रकाश कहते हैं। चैतन्य-भागवत, मध्य-खंड, अध्याय नौ में इस सात-प्रहरिया भाव का वर्णन है, जिसमें उल्लेख है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने दुखी नाम की एक दासी को सुखी नाम दिया। उन्होंने खोलावेचा श्रीधर को बुलाया और उसे अपना महा-प्रकाश दिखाया। फिर उन्होंने मुराई गुप्ता को बुलाया और उसे भगवान रामचंद्र के रूप में अपनी विशेषता दिखाई। उन्होंने हरिदास ठाकुर को अपना आशीर्वाद दिया, और इस समय उन्होंने अद्वैत प्रभु को भगवद-गीता को वैसे ही समझाने के लिए कहा (गीतारा सत्य-पाठ) और मुकुंद पर विशेष कृपा दिखाई।
