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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.17.18 
तबे स प्त - प्रहर छिला प्रभु भावावेशे ।
यथा तथा भक्त - गण देखिल विशेषे ॥18॥
 
 
अनुवाद
इस घटना के बाद भगवान इक्कीस घंटे तक आनंदित अवस्था में रहे और सभी भक्तों ने उनकी विशिष्ट लीलाएं देखीं।
 
After this incident, Mahaprabhu remained in a state of ecstasy for twenty-one hours and all the devotees witnessed his special leelas.
तात्पर्य
देवता के कमरे में उनके सिंहासन के पीछे उनके लिए एक बिस्तर होना चाहिए। (इस व्यवस्था को तुरंत हमारे सभी केंद्रों में लागू किया जाना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बिस्तर बड़ा हो या छोटा; यह उस आकार का होना चाहिए जिसे देवता कक्ष आसानी से समायोजित कर सके, लेकिन कम से कम एक छोटा बिस्तर होना चाहिए।) एक दिन श्रीवास ठाकुर के घर में, भगवान चैतन्य महाप्रभु विष्णु के बिस्तर पर बैठे, और सभी भक्तों ने सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात के साथ पुरुष-सूक्त के वैदिक मंत्रों से उनकी पूजा की। यदि संभव हो, तो देवताओं की स्थापना के लिए इस वेद-स्तुति को भी शुरू किया जाना चाहिए। देवता को स्नान कराते समय, सभी पुजारियों और भक्तों को इस पुरुष-सूक्त का जाप करना चाहिए और देवता की पूजा के लिए उपयुक्त सामग्री अर्पित करनी चाहिए, जैसे फूल, फल, धूप, आरती सामग्री, नैवेद्य, वस्त्र और आभूषण। सभी भक्तों ने इस तरह से भगवान चैतन्य महाप्रभु की पूजा की और प्रभु सात पहर या इक्कीस घंटे तक परमानंद में रहे। उन्होंने इस अवसर का उपयोग भक्तों को यह दिखाने के लिए किया कि वे भगवद गीता (10.8): अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते में पुष्टि की गई मूल परम भगवान, कृष्ण हैं जो अन्य सभी अवतारों के स्रोत हैं। भगवान विष्णु-तत्व के सभी विभिन्न रूप, या भगवान कृष्ण के शरीर से ही निकलते हैं। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों की सभी निजी इच्छाओं को उजागर किया, और इस तरह उन सभी को पूर्ण विश्वास हो गया कि भगवान चैतन्य परम भगवान हैं।

कुछ भक्त प्रभु द्वारा परमानंद के इस प्रदर्शन को सात-प्रहरिया भाव या "इक्कीस घंटे का परमानंद" कहते हैं, और अन्य इसे महाभाव-प्रकाश या महा-प्रकाश कहते हैं। चैतन्य-भागवत, मध्य-खंड, अध्याय नौ में इस सात-प्रहरिया भाव का वर्णन है, जिसमें उल्लेख है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने दुखी नाम की एक दासी को सुखी नाम दिया। उन्होंने खोलावेचा श्रीधर को बुलाया और उसे अपना महा-प्रकाश दिखाया। फिर उन्होंने मुराई गुप्ता को बुलाया और उसे भगवान रामचंद्र के रूप में अपनी विशेषता दिखाई। उन्होंने हरिदास ठाकुर को अपना आशीर्वाद दिया, और इस समय उन्होंने अद्वैत प्रभु को भगवद-गीता को वैसे ही समझाने के लिए कहा (गीतारा सत्य-पाठ) और मुकुंद पर विशेष कृपा दिखाई।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)