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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  1.17.168 
शुनि’ स्तब्ध हैल काजी, नाहि स्फुरे वाणी ।
विचारिया कहे काजी पराभव मा नि’ ॥168॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के ये वचन सुनकर काजी स्तब्ध होकर और कुछ न कह सका। अतः, विचार करने के बाद, काजी ने हार मान ली और इस प्रकार बोला।
 
Hearing these words from Sri Chaitanya Mahaprabhu, the Qazi became incomprehensible and could not speak a single word. After careful consideration, the Qazi accepted defeat and said the following.
तात्पर्य
हमारे व्यावहारिक उपदेश के काम में, हम अनेक ईसाइयों से मिलते हैं, जो बाइबल के वक्तव्यों के बारे में बात करते हैं। जब हम पूछते हैं कि ईश्वर सीमित है या असीमित, ईसाई पादरी कहते हैं कि ईश्वर असीमित है। लेकिन जब हम पूछते हैं कि असीमित ईश्वर का केवल एक ही पुत्र क्यों होना चाहिए और असीमित पुत्र क्यों नहीं, वे उत्तर देने में असमर्थ होते हैं। इसी तरह, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, पुराने नियम, नए नियम और कुरान के उत्तर कई प्रश्नों के बदल गए हैं। लेकिन कोई शास्त्र किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं बदल सकता। सभी शास्त्र मानवीय स्वभाव के चार दोषों से मुक्त होने चाहिए। शास्त्रों के कथन हर समय के लिए सही होने चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)