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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 159
 
 
श्लोक  1.17.159 
प्रभु कहे, - वेदे कहे गो - वध निषेध ।
अतएव हिन्दु - मात्र ना करे गो - वध ॥159॥
 
 
अनुवाद
काजी की बात का खंडन करते हुए भगवान ने तुरंत उत्तर दिया, "वेदों में स्पष्ट आदेश है कि गायों की हत्या नहीं की जानी चाहिए। इसलिए प्रत्येक हिंदू, चाहे वह कोई भी हो, गोहत्या से दूर रहता है।"
 
Contradicting the Qazi's statement, Mahaprabhu immediately said, "The Vedas clearly command against cow slaughter. Therefore, any Hindu avoids cow slaughter."
तात्पर्य
वैदिक ग्रंथों में मांसाहारियों के लिए छूट है। कहा गया है कि अगर कोई मांस खाना चाहे तो उसे काली माता के सामने बकरा काटकर उसका मांस खाना चाहिए। मांसाहारी लोगों को बाजार या कसाईखाने से मांस या भोजन खरीदने की अनुमति नहीं है। मांसाहारियों की ज़ुबान की संतुष्टि के लिए नियमित कसाईखाने रखने की कोई अनुमति नहीं है। जहाँ तक गाय के वध का सवाल है, यह पूरी तरह से वर्जित है। चूँकि गाय को माँ माना जाता है, तो वेद गाय के वध की अनुमति कैसे दे सकते हैं? श्री चैतन्य महाप्रभु ने बताया कि काजी का कथन दोषपूर्ण था। भगवद गीता (18.44) में स्पष्ट आदेश है कि गायों की रक्षा की जानी चाहिए: कृषि-गोरक्ष्य-वाणिज्य वैश्य-कर्म स्वभाव-जम। "वैश्यों का कर्तव्य है कृषि उत्पादों का उत्पादन, व्यापार और गायों की रक्षा करना।" इसलिए यह एक झूठा कथन है कि वैदिक ग्रंथों में गौ हत्या की अनुमति देने वाले आदेश हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)