श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  1.17.154 
पिता - माता मा रि’ खाओ - एबा को धर्म ।
को बले कर तुमि ए - मत विकर्म ॥154॥
 
 
अनुवाद
"जब बैल और गाय तुम्हारे माता-पिता हैं, तो तुम उन्हें कैसे मारकर खा सकते हो? यह कैसा धार्मिक सिद्धांत है? किस बल पर तुम इतने पाप कर्म करने का साहस कर रहे हो?"
 
"Since cows and bulls are your parents, how can you kill and eat them? What kind of religion is this? On what strength do you dare to commit such sinful acts?"
तात्पर्य
किसी को यह समझने में कोई परेशानी नहीं होती के हम गाय का दूध पीते हैं और कृषि उत्पादों को बनाने में बैलों की मदद लेते हैं। इसलिए चूँकि हमारे असली पिता हमें अनाज देते हैं और हमारी माताएँ हमें दूध देती हैं जिससे हम जीवित रहते हैं, गाय और बैल हमारे पिता और माता हैं। वैदिक संस्कृति के अनुसार, सात प्रकार की माताएँ होती हैं, जिनमे से एक गाय भी है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुसलमान काजी को गुस्से में चुनौती दी "तुम किस तरह के धर्मिक सिद्धांत का पालन करने का दावा करते हो जबकि तुम अपने पिता और माता को मार देते हो और फिर उन्हें खा जाते हो?" किसी भी सभ्य मानव समाज में, कोई अपने पिता और माता को इस उद्देश्य से नहीं मारेगा के वो उन्हें खायेगा। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुस्लमानों के धर्म की व्यवस्था को पितृ हत्या और मातृ हत्या के रूप में चुनौती दी। ईसाई धर्म में भी, एक प्रमुख आज्ञा यही है के "तुम हत्या नहीं करोगे।" हालाँकि, ईसाई धर्म इस नियम का उल्लंघन करते हैं; वे हत्या करने में और कसाईखाने खोलने में बहुत कुशल हैं। हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन में, हमारा पहला प्रावधान यह है कि किसी को भी किसी भी प्रकार का माँस खाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह कोई फ़र्क नहीं पड़ता के यह गाय का माँस है या बकरी का माँस, लेकिन हम विशेष रूप से गाय के माँस के निषेध पर ज़ोर देते हैं क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गाय हमारी माँ है। इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुसलमानों की गाय को मारने की प्रथा को चुनौती दी थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)