श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  1.17.145 
प्रभु बलेन, - आमि तोमार आइलाम अभ्यागते ।
आमि देखि लुकाइला, - ए - धर्म केमत ॥145॥
 
 
अनुवाद
प्रभु ने मित्रतापूर्वक कहा, "महाराज, मैं आपके घर अतिथि बनकर आया था, किन्तु मुझे देखकर आप अपने कमरे में छिप गए। यह कैसा शिष्टाचार है?"
 
Mahaprabhu said friendly, "Sir, I have come to your house as a guest, but you, upon seeing me, hid in your room. What kind of courtesy is this?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)