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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  1.17.133 
नगरे नगरे आजि करिमु कीर्तन ।
सन्ध्या - काले कर सभे नगर - मण्डन ॥133॥
 
 
अनुवाद
"शाम को मैं प्रत्येक नगर में संकीर्तन करूँगा। इसलिए तुम सब शाम को नगर को सजाओ।"
 
"I will go to every city and sing Sankirtan at dusk. So you all decorate the city at dusk."
तात्पर्य
उस समय नबद्वीप नौ छोटे नगरों से मिलकर बना था, इसलिए नगरे नगरे शब्द महत्वपूर्ण हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु इन पड़ोसी कस्बों में कीर्तन करना चाहते थे। उन्होंने इस समारोह के लिए शहर को सजाने का आदेश दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)