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श्लोक 125
श्लोक
1.17.125
क्रोधे सन्ध्या - काले काजी एक घरे आइल ।
मृदङ्ग भाङ्गिया लोके कहिते लागिल ॥125॥
अनुवाद
चांद काजी गुस्से में शाम को एक घर में आए और जब उन्होंने कीर्तन होते देखा तो उन्होंने मृदंग तोड़ा और इस प्रकार बोले।
One day Chand Qazi, filled with anger, came to a house in the evening and when he saw that kirtan was going on, he broke the drum and then spoke thus.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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