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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  1.17.123 
मृदङ्ग - करताल सङ्कीर्तन - महाध्वनि ।
‘हरि’ ‘हरि - ध्वनि विना अन्य नाहि शुनि ॥123॥
 
 
अनुवाद
जब इस प्रकार संकीर्तन आंदोलन शुरू हुआ, तो नवद्वीप में किसी को भी “हरि! हरि!” शब्दों और मृदंग की थाप और हाथ की घंटियों की आवाज के अलावा कोई अन्य ध्वनि सुनाई नहीं दे रही थी।
 
When the Sankirtan movement started in this way, no one could hear any other sound in Navadvipa except the sound of the words 'Hari!' 'Hari!' and the sound of the Mridang and the Kartal.
तात्पर्य
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ का अब अपना विश्व केंद्र नवद्वीप, मायापुर में है। इस केंद्र के प्रबंधकों को यह देखना चाहिए कि चौबीसों घंटे भगवान के पवित्र नामों का कीर्तन हो। साथ ही, हरे कृष्ण महामंत्र में हरे नमः, कृष्ण यादवाय नमः को भी जोड़ना होगा, क्योंकि यह गीत श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रिय गीत है। परन्तु इस पूरे संकीर्तन से पहले पाँच तत्वों के पवित्र नामों का कीर्तन ज़रूर करना होगा - श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु-नीत्यानंद श्री-अद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौर-भक्त-वृंद। हम इन दो मंत्रों का कीर्तन करने के अभ्यस्त हैं - श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु-नीत्यानंद श्री-अद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौर-भक्त-वृंद तथा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। अब, इसके बाद इन दो मंत्रों को जोड़ना ज़रूरी है - हरे नमः, कृष्ण यादवाय नमः / गोपाल गोविंद राम श्री-मधुसूदन। यहाँ मायापुर में तो इन छहों मंत्रों का कीर्तन इतनी अच्छी तरह होना चाहिए कि वहाँ कोई और आवाज़ ही न सुनाई दे, बस भगवान के पवित्र नामों का कीर्तन हो। इससे यह केंद्र आध्यात्मिक रूप से सर्वथा पूर्ण बनेगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)