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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  1.17.113 
सेइ - रूपे एइ - रूपे देखि एकाकार ।
कभु भेद देखि, एइ मायाय तोमार ॥113॥
 
 
अनुवाद
"मुझे पूरा विश्वास है कि आपका रूप और मैंने ध्यान में जो रूप देखा, वह एक ही है। अगर मुझे कोई अंतर दिखाई देता है, तो यह आपकी मायावी शक्ति का ही प्रभाव है।"
 
"I have no doubt that this form of yours and the form I see in meditation are the same. If I see any difference, it is the work of your Maya."
तात्पर्य
श्री कृष्ण चैतन्य राधा-कृष्ण नाहे अन्यः: एक पूर्ण भक्त की दृष्टि में श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु राधा और कृष्ण का संयोजन हैं | जो भी भगवान चैतन्य को कृष्ण से भिन्न देखता है वो भगवान की भ्रामक शक्ति में है | ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिषी पहले से ही एक उन्नत भक्त थे, और जब वे परम भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति में आए, तो वे पूरी तरह से आत्म-साक्षात्कार कर लिए और देख सकते थे कि भगवान कृष्ण और श्री चैतन्य महाप्रभु एक ही सर्वोच्च व्यक्ति हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)