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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  1.17.112 
सर्वज्ञ कहे आमि ताहा ध्याने देखिलाँ ।
ताहाते ऐश्वर्य दे खि’ फाँफर हइलाँ ॥112॥
 
 
अनुवाद
ज्योतिषी ने कहा, “ध्यान में मैंने जो देखा वह ऐश्वर्य से भरा था, इसलिए मैं भ्रमित हो गया।
 
The astrologer said, “What I saw in meditation was magnificent, that is why I got confused.”
तात्पर्य
ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिषी मात्र ज्योतिषीय गणनाओं के द्वारा भूत, वर्तमान और भविष्य का ज्ञाता ही नहीं था, बल्कि एक महान ध्यान करने वाला भी था। इसीलिए वह एक महान भक्त था और वह भगवान चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण के समान ही व्यक्तित्व के रूप में देख सकता था। हालाँकि, वह इस बात से हैरान था कि क्या कृष्ण और श्री चैतन्य महाप्रभु वास्तव में एक ही व्यक्ति थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)