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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  1.17.106 
परम - तत्त्व, पर - ब्रह्म, परम - ईश्वर ।
देखि’ प्रभुर मूर्ति सर्वज्ञ हइल फाँफर ॥106॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य महाप्रभु को वही परम सत्य, परम ब्रह्म, भगवान् समझकर ज्योतिषी भ्रमित हो गया।
 
Seeing Sri Chaitanya Mahaprabhu in the form of the Supreme Truth, the Supreme Brahman, the Lord, the astrologer was bewildered.
तात्पर्य
इसमें यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि परम सत्य, सर्वोच्च ब्राह्मण, अंततः सर्वोच्च भगवान है। इसलिए एक व्यक्ति सभी चीजों की शुरुआत है। जैसा कि भगवद्-गीता (10.8) में पुष्टि की गई है, "मत्तः सर्वं प्रवर्तते": सब कुछ सर्वोच्च भगवान से शुरू होता है। सर्वोच्च भगवान सर्वोच्च जीव है। इसलिए जो कुछ भी है, चाहे पदार्थ या आत्मा, सर्वोच्च व्यक्ति या सर्वोच्च जीवन से कुछ भी नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिकों का सिद्धांत है कि जीवन पदार्थ से शुरू होता है बकवास है। पदार्थ और जीवन दोनों जीवन से शुरू होते हैं। दुर्भाग्य से, वैज्ञानिकों को यह वैज्ञानिक तथ्य नहीं पता है; वे अपने तथाकथित ज्ञान के अंधेरे में बह रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)