यद्यपि ब्राह्मण भगवान चैतन्य के घर एक भिखारी के रूप में प्रकट हुए, भगवान चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बड़े सम्मान के साथ प्राप्त किया क्योंकि वह एक योग्य ब्राह्मण थे जो ज्योतिष विज्ञान को पूरी तरह से जानते थे। हालाँकि ब्राह्मण भिखारियों की तरह घर-घर जाते थे, उन्हें बहुत सम्मानित अतिथि के रूप में सम्मानित किया जाता था। पाँच सौ साल पहले चैतन्य महाप्रभु के समय में हिंदू समाज में यही व्यवस्था थी। यह व्यवस्था सौ साल पहले भी प्रचलित थी; यहाँ तक कि पचास या साठ साल पहले, जब हम बच्चे थे, ऐसे ब्राह्मण विनम्र भिखारियों की तरह गृहस्थों से मिलने जाते थे, और लोग ऐसे ब्राह्मणों की दया से बहुत लाभ उठाते थे। सबसे बड़ा लाभ यह था कि एक गृहस्थ डॉक्टर के बिलों पर खर्च होने वाले बहुत सारे पैसे बचा सकता था क्योंकि ब्राह्मण, अतीत, वर्तमान और भविष्य की व्याख्या करने के अलावा, आमतौर पर केवल निर्देश और कुछ दवा देकर सभी प्रकार की बीमारियों को ठीक कर सकते थे। इस प्रकार कोई भी प्रथम श्रेणी के चिकित्सक, ज्योतिषी और पुजारी के लाभ से वंचित नहीं था। ISKCON के महत्वपूर्ण सदस्यों को हमारे डलास स्कूल पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना चाहिए, जहाँ बच्चों को संस्कृत और अंग्रेजी सिखाई जा रही है ताकि वे पूर्ण ब्राह्मण बन सकें। यदि उन्हें वास्तव में पूर्ण ब्राह्मण के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है, तो वे समाज को दुष्टों और बदमाशों से बचा सकते हैं; निश्चय ही, लोग योग्य ब्राह्मणों के संरक्षण में सुखपूर्वक रह सकते हैं। इसलिए भगवद्-गीता (4.13) समाज के विभाजन (चतुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्मविभागश:) पर विशेष जोर देती है। दुर्भाग्य से कुछ लोग अब बिना किसी योग्यता के केवल जन्मसिद्ध अधिकार से ब्राह्मण होने का दावा कर रहे हैं। इसलिए समाज पूरी तरह से अराजकता में है।
