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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  1.17.103 
आर दिने ज्योतिष सर्वज्ञ एक आइल ।
ताहारे सम्मान क रि’ प्रभु प्रश्न कैल ॥103॥
 
 
अनुवाद
एक दिन एक ज्योतिषी आए, जिनके बारे में कहा जाता था कि वे भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ जानते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका पूरे सम्मान के साथ स्वागत किया और उनके समक्ष यह प्रश्न रखा।
 
Another day, an astrologer arrived, who was considered to know everything—past, present, and future. So, Mahaprabhu honored him and asked him this question.
तात्पर्य
ब्राह्मण आम तौर पर ज्योतिषी, वैद्य, शिक्षक और पुजारी बनते थे। यद्यपि अत्यधिक विद्वान और प्रतिष्ठित, ऐसे ब्राह्मण अपने ज्ञान को वितरित करने के लिए घर-घर जाते थे। एक ब्राह्मण पहले एक विशेष तिथि या दिन पर किए जाने वाले कार्यों की जानकारी देने के लिए एक गृहस्थ के घर जाता था, लेकिन अगर परिवार में बीमारी होती थी, तो परिवार के सदस्य ब्राह्मण से एक चिकित्सक के रूप में सलाह लेते थे, और ब्राह्मण निर्देश और कुछ दवा देता था। अक्सर, चूंकि ब्राह्मण ज्योतिष में विशेषज्ञ होते थे, इसलिए लोग उनके अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में भी बहुत उत्सुक होते थे।

यद्यपि ब्राह्मण भगवान चैतन्य के घर एक भिखारी के रूप में प्रकट हुए, भगवान चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बड़े सम्मान के साथ प्राप्त किया क्योंकि वह एक योग्य ब्राह्मण थे जो ज्योतिष विज्ञान को पूरी तरह से जानते थे। हालाँकि ब्राह्मण भिखारियों की तरह घर-घर जाते थे, उन्हें बहुत सम्मानित अतिथि के रूप में सम्मानित किया जाता था। पाँच सौ साल पहले चैतन्य महाप्रभु के समय में हिंदू समाज में यही व्यवस्था थी। यह व्यवस्था सौ साल पहले भी प्रचलित थी; यहाँ तक कि पचास या साठ साल पहले, जब हम बच्चे थे, ऐसे ब्राह्मण विनम्र भिखारियों की तरह गृहस्थों से मिलने जाते थे, और लोग ऐसे ब्राह्मणों की दया से बहुत लाभ उठाते थे। सबसे बड़ा लाभ यह था कि एक गृहस्थ डॉक्टर के बिलों पर खर्च होने वाले बहुत सारे पैसे बचा सकता था क्योंकि ब्राह्मण, अतीत, वर्तमान और भविष्य की व्याख्या करने के अलावा, आमतौर पर केवल निर्देश और कुछ दवा देकर सभी प्रकार की बीमारियों को ठीक कर सकते थे। इस प्रकार कोई भी प्रथम श्रेणी के चिकित्सक, ज्योतिषी और पुजारी के लाभ से वंचित नहीं था। ISKCON के महत्वपूर्ण सदस्यों को हमारे डलास स्कूल पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना चाहिए, जहाँ बच्चों को संस्कृत और अंग्रेजी सिखाई जा रही है ताकि वे पूर्ण ब्राह्मण बन सकें। यदि उन्हें वास्तव में पूर्ण ब्राह्मण के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है, तो वे समाज को दुष्टों और बदमाशों से बचा सकते हैं; निश्चय ही, लोग योग्य ब्राह्मणों के संरक्षण में सुखपूर्वक रह सकते हैं। इसलिए भगवद्-गीता (4.13) समाज के विभाजन (चतुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्मविभागश:) पर विशेष जोर देती है। दुर्भाग्य से कुछ लोग अब बिना किसी योग्यता के केवल जन्मसिद्ध अधिकार से ब्राह्मण होने का दावा कर रहे हैं। इसलिए समाज पूरी तरह से अराजकता में है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)