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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  1.17.100 
महेश - आवेश हैला शचीर नन्दन ।
तार स्कन्धे चड़ि नृत्य कैल बहु - क्षण ॥100॥
 
 
अनुवाद
तब भगवान चैतन्य ने भगवान शिव का रूप धारण कर उस व्यक्ति के कंधों पर सवार हो गए और इस प्रकार वे दोनों बहुत देर तक साथ-साथ नृत्य करते रहे।
 
Then Chaitanya Mahaprabhu, in the ecstasy of Lord Shiva, climbed on the man's shoulder and thus both of them danced together for a long time.
तात्पर्य
भगवान चैतन्य महाप्रभु ने भगवान शिव का मूड अपनाया, क्योंकि वे भी शिव हैं। अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्व के दर्शन के अनुसार, भगवान शिव भगवान विष्णु से अलग नहीं हैं, लेकिन फिर भी भगवान शिव भगवान विष्णु नहीं हैं, जैसे दही दूध के अलावा कुछ नहीं है और फिर भी दही दूध नहीं है। कोई दही पीकर दूध का लाभ नहीं पा सकता। इसी तरह, भगवान शिव की पूजा करने से मोक्ष नहीं मिल सकता। यदि कोई मोक्ष चाहता है, तो उसे भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इसे भगवद गीता (9.4) में पुष्टि की गई है: मत-स्था नि सर्व-भूतनि न चााхам टेषव अवस्थितः। सब कुछ भगवान पर टिका हुआ है, क्योंकि सब कुछ उसकी ऊर्जा है, फिर भी वह हर जगह नहीं है। भगवान चैतन्य द्वारा भगवान शिव का मूड अपनाना असाधारण नहीं है, लेकिन इसलिए किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान शिव की पूजा करके वह भगवान चैतन्य की पूजा कर रहे हैं। यह एक गलती होगी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)