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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.17.10 
शचीके प्रेम - दान, तबे अद्वैत - मिलन ।
अद्वैत पाइल विश्वरूप - दरशन ॥10॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भगवान ने अपनी माता शचीदेवी को कृष्ण-प्रेम प्रदान किया और अद्वैत आचार्य के चरणों में उनके अपराध का निवारण किया। इस प्रकार अद्वैत आचार्य से उनकी भेंट हुई, जिन्हें बाद में भगवान के विश्वरूप का दर्शन हुआ।
 
Mahaprabhu then forgave his mother, Shachidevi, for the offense she had committed against Advaita Acharya's lotus feet and bestowed upon him love for Krishna. Thus, Advaita Acharya met and later had a vision of the Lord's universal form.
तात्पर्य
एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु, श्रीवास प्रभु के घर में विष्णु के सिंहासन पर विराजित थे और अपने ही भाव से बोले, "मेरी माँ ने अद्वैत आचार्य के चरण कमलों का अपमान किया है। जब तक वह वैष्णव के चरण कमलों में इस अपराध का निवारण नहीं कर लेती, उसके लिए कृष्ण प्रेम पाना संभव नहीं हो पायेगा।" इसे सुनकर सभी भक्त अद्वैत आचार्य को वहाँ लाने चले गए। भगवान से मिलने आते समय, अद्वैत आचार्य माता शची देवी के गुणों का गुणगान कर रहे थे और इस तरह आने पर वे परमानंद में जमीन पर गिर पड़े। फिर, भगवान चैतन्य के निर्देश पर, शची देवी ने इस स्थिति का लाभ उठाकर अद्वैत आचार्य के चरण कमलों को स्पर्श किया। श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी माँ के इस कार्य से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, "अब मेरी माँ का अद्वैत आचार्य के चरण कमलों में अपराध समाप्त हो गया है और वह बिना किसी कठिनाई के कृष्ण प्रेम पा सकती है।" इस उदाहरण के द्वारा भगवान चैतन्य ने सभी को सिखाया कि यद्यपि कोई कृष्ण भावना में बहुत अधिक उन्नत हो सकता है, लेकिन अगर वह वैष्णव के चरण कमलों का अपमान करता है तो उसकी उन्नति फलित नहीं होगी। इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि वैष्णव का अपमान न किया जाए। श्री चैतन्य-चैरिटामृत ने इस तरह के अपराध का वर्णन इस प्रकार किया है:

यादि वैष्णव-अपराध उठे हाती माता

उपाड़े वा चिंडे, तार शुखी' याय पाता

(चै.मध्य १९.१५६)

जैसे एक पागल हाथी बगीचे में सभी पौधों को रौंद सकता है, उसी तरह वैष्णव के चरण कमलों में एक अपराध करने से कोई भी जीवन में अर्जित सभी भक्ति सेवाओं को खराब कर सकता है।

इस घटना के बाद, एक दिन अद्वैत आचार्य प्रभु ने चैतन्य महाप्रभु से अनुरोध किया कि वे ब्रह्मांडीय रूप दिखाएँ जिसे उन्होंने बहुत दयालुतापूर्वक अर्जुन को दिखाया था। भगवान चैतन्य इस प्रस्ताव के लिए सहमत हो गए और अद्वैत प्रभु भाग्यशाली थे जो भगवान के ब्रह्मांडीय रूप को देखने को मिला।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)