यादि वैष्णव-अपराध उठे हाती माता
उपाड़े वा चिंडे, तार शुखी' याय पाता
(चै.मध्य १९.१५६)
जैसे एक पागल हाथी बगीचे में सभी पौधों को रौंद सकता है, उसी तरह वैष्णव के चरण कमलों में एक अपराध करने से कोई भी जीवन में अर्जित सभी भक्ति सेवाओं को खराब कर सकता है।
इस घटना के बाद, एक दिन अद्वैत आचार्य प्रभु ने चैतन्य महाप्रभु से अनुरोध किया कि वे ब्रह्मांडीय रूप दिखाएँ जिसे उन्होंने बहुत दयालुतापूर्वक अर्जुन को दिखाया था। भगवान चैतन्य इस प्रस्ताव के लिए सहमत हो गए और अद्वैत प्रभु भाग्यशाली थे जो भगवान के ब्रह्मांडीय रूप को देखने को मिला।
