श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.16.58 
अनुवादमनुक्त्वैव न विधेयमुदीरयेत् ।
न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित्कुत्रचित्प्रतितिष्ठति ॥58॥
 
 
अनुवाद
“‘जो ज्ञात है उसका उल्लेख किए बिना, अज्ञात का परिचय नहीं देना चाहिए, क्योंकि जिसका कोई ठोस आधार नहीं है, वह कभी भी कहीं स्थापित नहीं हो सकता।’
 
“One should not give place to the unknown without first mentioning the known, because that which does not have a solid foundation cannot be established anywhere.”
तात्पर्य
यह एकादशी-तत्त्व का एक श्‍लोक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)