श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.16.57 
‘विधेय’ आगे क हि’ पाछे कहिले ‘अनुवाद’ ।
एइ ला गि’ श्लोकेर अर्थ करियाछे बाध ॥57॥
 
 
अनुवाद
“चूँकि आपने ज्ञात विषय को अंत में और अज्ञात को आरंभ में रखा है, इसलिए रचना दोषपूर्ण है, और शब्दों का अर्थ संदिग्ध हो गया है।
 
“Since you have placed the known subject (the object or translation) at the end and the unknown (the predicate) at the beginning, this construction is faulty and the meaning of the words has become doubtful.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)