विमृष्ट का अर्थ है "स्वच्छ", और विधेयांश का मतलब है "विधेय"। रचना का यह एक सामान्य नियम है कि पहले विषय स्थापित करना चाहिए और फिर उसके विधेय को बताना चाहिए। उदाहरण के लिए, संस्कृत व्याकरण के अनुसार यदि कोई यह कहता है, “यह मनुष्य विद्वान है”, तो उसकी रचना सही है। लेकिन अगर कोई यह कहता है, “विद्वान यह मनुष्य है”, तो रचना सही नहीं है। ऐसी त्रुटि को विमृष्ट-विधेयांश-दोष कहा जाता है, या अशुद्ध रचना की त्रुटि। इस छंद में जिस विषय वस्तु के बारे में बताया जाना है वह गंगा का गुणगान है, और इसलिए शब्द इदम् (“यह” या जो ज्ञात है) को गुणगान के पहले रखा जाना चाहिए था उसके बाद नहीं। जो विषय वस्तु पहले से ज्ञात है उसे अज्ञात के पहले रखा जाना चाहिए ताकि उसका मतलब गलत न समझा जाए।
विमृष्ट-विधेयांश-दोष का दूसरा उदाहरण शब्दों द्वितीय-श्री-लक्ष्मीर इव में मिलता है। इस रचना में शब्द द्वितीय (“दूसरा”) विधेय या अज्ञात है। द्वितीय-श्री-लक्ष्मीर इस यौगिक शब्द को बनाने के लिए अज्ञात को पहले रखना दूसरी त्रुटि है। शब्दों द्वितीय-श्री-लक्ष्मीर इव का उद्देश्य गंगा की तुलना देवी लक्ष्मी से करना था, लेकिन इस गलती के कारण यौगिक शब्द का अर्थ भ्रामक हो गया।
तीसरी त्रुटि विरुद्ध-मति या विरोधाभासी अवधारणा की है जो शब्दों भावनी-भर्तुः में है। शब्द भावनी का मतलब भव, भगवान शिव की पत्नी होता है। लेकिन क्योंकि भावनी पहले से ही भगवान शिव की पत्नी के रूप में जानी जाती है, इसलिए शब्द भर्ता, “पति” को जोड़ने पर, जो कि एक यौगिक अर्थ “भगवान शिव की पत्नी का पति” का निर्माण करता है, विरोधाभासी बन जाता है, क्योंकि इस तरह यह प्रतीत होता है कि भगवान शिव की पत्नी का एक और पति है।
चौथी त्रुटि पुनर-उक्ति या अतिरेक की है, जो तब होती है जब क्रिया विभवति (“समृद्ध होता है”), जिससे रचना समाप्त होनी चाहिए थी, को आगे अनावश्यक विशेषण आद्भुत-गुणा (“आश्चर्यजनक गुणों से युक्त”) से अर्हक बना दिया जाता है। पाँचवी त्रुटि भग्न-क्रम की है, जिसका मतलब है “टूटा हुआ क्रम”। पहली, तीसरी और चौथी पंक्ति में त, र और भ की ध्वनियों से अनुप्रास या अलंकार बना है, लेकिन दूसरी पंक्ति में इस तरह का कोई अनुप्रास नहीं है और इसलिए क्रम टूट जाता है।
