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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.16.52 
नाहि पड़ि अलङ्कार, करियाछि श्रवण ।
ताते एइ श्लोके देखि बहु दोष - गुण ॥52॥
 
 
अनुवाद
"निश्चित रूप से मैंने साहित्यिक अलंकरण की कला का अध्ययन नहीं किया है। लेकिन मैंने इसके बारे में उच्च वर्ग से सुना है, और इसलिए मैं इस पद्य की समीक्षा कर सकता हूँ और इसमें कई दोष और कई गुण पा सकता हूँ।"
 
Of course, I haven't read the rhetoric. But I have heard about it from learned people, so I can review this verse and find many flaws and many strengths in it."
तात्पर्य
अभिव्यक्ति कर्णियाची श्रवण ("मैंने इसे सुना है") इस अर्थ में अत्यंत महत्वपूर्ण है कि श्रवण प्रत्यक्ष अध्ययन या अनुभूति से अधिक महत्वपूर्ण है। यदि कोई श्रवण में विशेषज्ञ है और सही स्रोत से सुनता है, तो उसका ज्ञान तुरंत पूर्ण हो जाता है। इस प्रक्रिया को श्रौत-पंथ कहा जाता है, या अधिकारियों से सुनकर ज्ञान प्राप्त करना। सभी वैदिक ज्ञान इस सिद्धांत पर आधारित है कि व्यक्ति को एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के पास जाना चाहिए और वेदों के आधिकारिक कथनों को उनसे सुनना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी के लिए एक अत्यधिक परिष्कृत साहित्यकार होना आवश्यक नहीं है; एक पूर्ण व्यक्ति से पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को श्रवण में विशेषज्ञ होना चाहिए। इसे निगमनात्मक ज्ञान की अवरोही प्रक्रिया, या अवरोह-पंथ कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)