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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.16.50 
व्याकरणिया तुमि नाहि पड़ अलङ्कार ।
तुमि कि जानिबे एइ कवित्वेर सार ॥50॥
 
 
अनुवाद
"आप व्याकरण के एक साधारण विद्यार्थी हैं। साहित्यिक अलंकरणों के बारे में आपको क्या पता? आप इस कविता की समीक्षा नहीं कर सकते क्योंकि आपको इसके बारे में कुछ भी नहीं पता।"
 
"You're just a mere student of grammar. What do you know about the figures of speech of poetics? You can't critique this poem, because you have no knowledge of it."
तात्पर्य
केशव काश्मीरी पहले श्री चैतन्य महाप्रभु से झांसा इसलिए मारना चाहते थे कि चूंकि वह साहित्य शैली में उन्नत छात्र नहीं थे, इसलिए वह साहित्यिक आभूषणों और रूपकों से भरे श्लोकों की समीक्षा नहीं कर सकते थे। इस तर्क का कुछ तथ्यात्मक आधार है। जब तक कोई चिकित्सकीय व्यक्ति न हो, वह किसी चिकित्सकीय व्यक्ति की आलोचना नहीं कर सकता, और जब तक कोई वकील न हो, वह किसी वकील की आलोचना नहीं कर सकता। इसलिए केशव काश्मीरी ने पहले प्रभु की स्थिति को कम आंका। क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु व्याकरण के एक छात्र थे, तो वह उनके जैसे महान कवि की आलोचना कैसे कर सकते थे? इसलिए प्रभु चैतन्य ने कवि की आलोचना एक अलग तरीके से की। उन्होंने कहा कि हालांकि वह निश्चित रूप से एक साहित्यिक कैरियर में उन्नत नहीं थे, लेकिन उन्होंने दूसरों से सुना था कि इस तरह से कविता की आलोचना कैसे की जाती है, और एक श्रुति-धार, एक पूर्ण स्मृति के रूप में, वह ऐसी समीक्षा के लिए प्रक्रिया को समझ सकते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)