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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.16.44 
प्रभु कहे, देवेर वरे तुमि - ‘कवि - वर’ ।
ऐछे देवेर वरे केहो ह य’ श्रुतिधर’ ॥44॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने उत्तर दिया, "भगवान की कृपा से कोई महान कवि बन सकता है, और इसी प्रकार उनकी कृपा से कोई अन्य व्यक्ति महान श्रुतिधर बन सकता है जो किसी भी बात को तुरंत याद कर सकता है।"
 
Mahaprabhu replied, “Just as by the grace of God some become great poets, in the same way by His grace some can also become great Shrutidhar, who can remember anything instantly.”
तात्पर्य
इस संबंध में श्रुति-धार एक बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है। श्रुति का अर्थ है "सुनना" और धार का अर्थ है "वह जो ग्रहण कर सकता है"। पूर्व काल में, कली-युग के प्रारंभ से पहले, लगभग सभी, विशेष रूप से बुद्धिमान पुरुषों और ब्राह्मणों के बीच, श्रुति-धार होते थे। जैसे ही कोई शिष्य अपने गुरु से किसी भी वैदिक ज्ञान को सुनता था, वह उसे हमेशा के लिए याद रखता था। पुस्तकों को संदर्भित करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, और इसलिए उन दिनों कोई लिखित किताबें नहीं थीं। आध्यात्मिक गुरु वैदिक मंत्रों और उनकी व्याख्याओं को शिष्य को देते थे, जो फिर उन्हें हमेशा के लिए याद रखते थे, बिना पुस्तकों की सहायता के।

एक श्रुति-धार बनने के लिए, जो केवल सुनने से ही याद रख सकता है, एक शिष्य के लिए एक महान उपलब्धि है। भगवद-गीता (10.41) में भगवान कहते हैं:

यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूरजितं एव वा

तद् तदेवावगच्छ त्वं माम तेजोऽंश-सम्भवम्

"जानिए कि सभी संपन्न, सुंदर और शानदार रचनाएं मेरे वैभव की एक चिंगारी से ही उत्पन्न होती हैं।"

जैसे ही हमें कुछ भी असाधारण लगता है, हमें यह समझना चाहिए कि इस तरह की असाधारण अभिव्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की विशेष कृपा है। इसलिए भगवान चैतन्य महाप्रभु ने चैंपियन, केशव कश्मीरी को उत्तर दिया कि जिस तरह वह माता सरस्वती के प्रिय भक्त होने पर बहुत गर्व करते थे, उसी तरह कोई और, स्वयं चैतन्य महाप्रभु की तरह, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के पक्षधर होकर श्रुति-धार बन सकता है और इस तरह कुछ भी याद कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)