एक श्रुति-धार बनने के लिए, जो केवल सुनने से ही याद रख सकता है, एक शिष्य के लिए एक महान उपलब्धि है। भगवद-गीता (10.41) में भगवान कहते हैं:
यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूरजितं एव वा
तद् तदेवावगच्छ त्वं माम तेजोऽंश-सम्भवम्
"जानिए कि सभी संपन्न, सुंदर और शानदार रचनाएं मेरे वैभव की एक चिंगारी से ही उत्पन्न होती हैं।"
जैसे ही हमें कुछ भी असाधारण लगता है, हमें यह समझना चाहिए कि इस तरह की असाधारण अभिव्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की विशेष कृपा है। इसलिए भगवान चैतन्य महाप्रभु ने चैंपियन, केशव कश्मीरी को उत्तर दिया कि जिस तरह वह माता सरस्वती के प्रिय भक्त होने पर बहुत गर्व करते थे, उसी तरह कोई और, स्वयं चैतन्य महाप्रभु की तरह, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के पक्षधर होकर श्रुति-धार बन सकता है और इस तरह कुछ भी याद कर सकता है।
